Songs of Shailendra::
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Salil Chowdhury

This category contains 78 posts

१९५४ – नौकरी – एक छोटी-सी नौकरी का तलबगार | 1954 – Naukri – ek chhoti si naukri ka talabgar

एक छोटी-सी नौकरी का तलबगार हूँ मैं तुमसे कुछ और जो माँगूँ तो गुनहगार हूँ मैं एक छोटी-सी नौकरी का तलबगार हूँ मैं एक-सौ-आँठवीं अर्ज़ी मेरे अरमानों की कर लो मंज़ूर कि बेकारी से बेज़ार हूँ मैं मैं कलेक्टर न बनूँ और न बनूँगा अफ़सर अपना बाबू ही बना लो मुझे बेकार हूँ मैं मैंने … Continue reading →

१९५४ – नौकरी – मन रे न ग़म कर | 1954 – Naukri – man re na gham kar

ओ मन रे, ना ग़म कर ये आँसू बनेंगे सितारे, जुदाई में दिल के सहारे बिछड़के भी हमसे जहाँ भी रहें वो, रहेंगे हमारे ओ मन रे, ना ग़म कर ये आँसू बनेंगे सितारे, जुदाई में दिल के सहारे जिधर से वो जाएँ आकाश पैरों में कलियाँ बिछा दे जहाँ रात हो कोई चुपके-से राहों … Continue reading →

१९५४ – नौकरी – झूमे रे कली, भँवरा उलझ गया | 1954 – Naukri – jhoome re kali, bhanwra ulajh gaya

झूमे रे कली, भँवरा उलझ गया काँटों में बन-बन ढूँढ़े पवन शराबी गगन कहे, चुपके-से फूल खिला काँटों में झूमे रे कली, भँवरा उलझ गया काँटों में साँझ-सवेरे दिल को घेरे, कौन ये मुझपे जादू फेरे सब समझावें प्रीत बुरी है लगन कहे, जीवन का चैन छुपा काँटों में झूमे रे कली, भँवरा उलझ गया … Continue reading →

१९५४ – नौकरी – छोटा-सा घर होगा | 1954 – Naukri – chhota sa ghar hoga

छोटा-सा घर होगा बादलों की छाँव में आशा दीवानी मन में बँसुरी बजाए हम ही हम चमकेंगे तारों के उस गाँव में आँखों की रौशनी हरदम ये समझाए चाँदी की कुर्सी पे बैठे मेरी छोटी बहना सोने के सिंघासन पे बैठे मेरी प्यारी माँ मेरा क्या मैं पड़ा रहूँगा अम्मीजी के पाँव में आ आ … Continue reading →

१९५८ – मुसाफ़िर – लागी नाही छूटे राम चाहे जिया जाए | 1958 – Musafir – laagi naahi chhute raam, chaahe jiya jaye

लागी नाही छूटे राम, चाहे जिया जाए मन अपनी मस्ती का जोगी, कौन इसे समझाए कौन इसे समझाए, रामा लागी नाही छूटे रामा, चाहे जिया जाए तारों में मुस्कान है तेरी, चाँद तेरी परछाँईं उतने गीत हैं जितनी रातें हमने साथ बिताईं कैसे बोलूँ रे साँवरिया, करूँ मैं कौन उपाय चाहे जिया जाए रिमझिम-रिमझिम बुँदियाँ … Continue reading →

१९५८ – मुसाफ़िर – एक आए एक जाए मुसाफ़िर | 1958 – Musafir – ek aaye ek jaye musafir

एक आए, एक जाए मुसाफ़िर, दुनिया एक सराए रे एक आए, एक जाए मुसाफ़िर अलबेले अरमानों के तूफ़ान लेकर आए नादन सौ बरस के सामान लेकर आए और धूल उड़ाता चला जाए एक आए, एक जाए मुसाफ़िर, दुनिया एक सराए रे एक आए, एक जाए मुसाफ़िर दिल की ज़ुबाँ अपनी है, दिल की नज़र भी … Continue reading →

१९५८ – मुसाफ़िर – मुन्ना बड़ा प्यारा अम्मी का दुलारा | 1958 – Musafir – munna bada pyara ammi ka dulara

मुन्ना बड़ा प्यारा, अम्मी का दुलारा कोई कहे चाँद, कोई आँख का तारा हँसे तो भला लगे, रोए तो भला लगे अम्मी को उसके बिना कुछ भी अच्छा न लगे जियो मेरे लाल, जियो मेरे लाल तुमको लगे मेरी उमर, जियो मेरे लाल मुन्ना बड़ा प्यारा, अम्मी का दुलारा कोई कहे चाँद, कोई आँख का … Continue reading →

१९५८ – मुसाफ़िर – मन रे हरि के गुण गा | 1958 – Musafir – man re, hari ke gun gaa

हरि के गुण गा, मन रे, हरि के गुण गा उन संग प्रीत लगा, मन रे मन रे, हरि के गुण गा जिनके जपे अहल्या तर गई, भवसागर के पार उतर गई सन्मुख शीश झुका, मन रे मन रे, हरि के गुण गा जिनके जपे अमर भई मीरा, नाम उजागर कर गई मीरा लौ उनसे … Continue reading →

१९६४ – मेम दीदी – हु तू तू तू | 1964 – Mem Didi – hu tu tu tu

हु तू तू तू, तू तू, हु तू तू तू, तू हम तो घर में चूल्हा फूँकें, मज़े करे तू हु तू तू तू, तू तू, हु तू तू तू, तू हम तो लड़ें ज़िंदगी से, हमसे लड़े तू हु तू तू तू, तू ढोल बाजे, ताशे बाजे और बाजी शहनाई बाबुल की मैं लाडली … Continue reading →

१९६४ – मेम दीदी – बेटा वाओ वाओ वाओ, मेरे कान मत खाओ | 1964 – Mem Didi – beta wow wow, mere kaan mat khao

बेटा वाओ वाओ वाओ, मेरे कान मत खाओ सोने की कटोरी में चलके दूध-भात खाओ बेटा वाओ वाओ वाओ आज मैं छुईमुई लड़की, बहू बनूँगी बड़े घर की होगा तू दरबान मेरा, रानी मैं रूपनगर की बेटा वाओ वाओ वाओ … लंच-डिनर पे हरदिन रहेगा आना-जाना खाएँगे हम बिर्यानी, और तू बिस्कुट खाना बेटा वाओ … Continue reading →