Songs of Shailendra::
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Shankar-Jaikishan

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१९६२ – प्रोफ़ेसर – खुली पलक में झूठा ग़ुस्सा | 1962 – Professor – khuli palak mein jhootha gussa

ज़रा ठहरो सदा मेरे दिल की ज़रा सुनते जाना खुली पलक में झूठा ग़ुस्सा, बंद पलक में प्यार जीना भी मुश्किल, मरना भी मुश्किल आँखों में इक़रार की झलकी, होंठों पे इनकार जीना भी मुश्किल, मरना भी मुश्किल जिस दिन से देखा तुमको, तुम लगे मुझे अपने-से और आके रहे आँखों में, एक मनचाहे सपने-से … Continue reading

१९५३ – पतिता – मिट्टी से खेलते हो बार-बार | 1953 – Patita – mitti se khelte ho baar baar kisliye

मिट्टी से खेलते हो बार-बार किसलिए टूटे हुए खिलौनों से प्यार किसलिए मिट्टी से खेलते हो बार-बार किसलिए बनाके ज़िंदगानियाँ बिगाड़ने से क्या मिला मेरी उम्मीद का जहाँ उजाड़ने से क्या मिला आई थी दो दिनों की ये बहार किसलिए मिट्टी से खेलते हो बार-बार किसलिए ज़रा-सी धूल को हज़ार रूप नाम दे दिए ज़रा-सी … Continue reading

१९५२ – पूनम – दो दिन की ज़िंदगी में | 1952 – Poonam – do din ki zindagi mein

दो दिन की ज़िंदगी में दुखड़े हैं बेशुमार दुखड़े हैं बेशुमार है ज़िंदगी उसीकी जो हँस-हँसके दे गुज़ार हँस-हँसके दे गुज़ार उभरेंगे फिर सितारे, चमकेगा फिर से चाँद चमकेगा फिर से चाँद उजड़े हुए चमन में आएगी फिर बहार आएगी फिर बहार है ज़िंदगी उसीकी जो हँस-हँसके दे गुज़ार हँस-हँसके दे गुज़ार है धूप कहीं … Continue reading

१९५२ – पूनम – झुम्मक-झुम्मक चल मेरे हाथी | 1952 – Poonam – jhummak jhummak chal mere haathi

झुम्मक-झुम्मक चल मेरे हाथी, चल मेरे हाथी दूल्हा बनके गुड्डा निकला, पीछे चलें बाराती झुम्मक-झुम्मक चल मेरे हाथी, चल मेरे हाथी जल्दी-जल्दी चल मेरे भाई, गुडिया का घर दूर है अपने संग एक बुड़्ढा बाबा चलने से मजबूर है गुडिया का घर दूर है, होय झुम्मक-झुम्मक चल मेरे हाथी … नीचे अपना दूल्हा राजा, ऊपर … Continue reading

१९५२ – पूनम – दिन सुहाने, ये मौसम बहार का | 1952 – Poonam – din suhane ye mausam bahar ka

दिन सुहाने, ये मौसम बहार का दिल ये चाहे, मैं गाऊँ गीत प्यार का दिन सुहाने, ये मौसम बहार का ये धड़कन, ये मस्ती, ये हलचल ये जवानी पे ख़ुशियों का आँचल कहना क्या ज़िंदगी के सिंगार का मौसम बहार का दिन सुहाने, ये मौसम बहार का जी ये चाहे कि अपना हो कोई नींद … Continue reading

१९५६ – नई दिल्ली – अरे भाई निकलके आ घर से | 1956 – New Delhi – are bhai nikalke aa ghar se

अरे भाई निकल के आ घर से आ घर से दुनिया की रौनक देख फिर से देख ले फिर से अरे भाई निकल के आ घर से केम ऊंघे छे भाई घनशामजी हो केम ऊंघे छे भाई घनशामजी दुनिया बदल गई प्यारे आगे निकल गई प्यारे अँधे कुँए में छुपके क्यूँ बैठा हुआ है मन … Continue reading

१९५६ – नई दिल्ली – गोरी तेरे सपनों के सजना | 1956 – New Delhi – gori tere sapnon ke sajna

गोरी तेरे सपनों के सजना आए तेरे अंगना कर ले सोलह सिंगार हो जा जाने को अब तैयार लेके डोली खड़े हैं कहार कल से बालम के रंग रंग जाएगी तू उनके मन के महल को सजाएगी तू बीते जो दिन भूल जाना सखी भूल जाना वो बचपन का प्यार लेके डोली खड़े हैं कहार … Continue reading

१९५६ – नई दिल्ली – मिलते-ही नज़र आप मेरे दिल में आ गए | 1956 – New Delhi – milte hi nazar aap mere dil mein aa gaye

मिलते-ही नज़र आप मेरे दिल में आ गए अफ़्सोस है कि आप भी मुश्किल में आ गए मिलते-ही नज़र आप मेरे दिल में आ गए दिल के कहने पे बढ़ते गए ये क़दम क्या ख़बर थी डगर भूल जाएँगे हम जाते थे कहीं और कहीं और आ गए मिलते-ही नज़र … नैन जादूभरे मुस्कुराते गए … Continue reading

१९५६ – नई दिल्ली – नख़रेवाली, देखने में देख लो हैं कैसी | 1956 – New Delhi – nakhrewali dekhne mein dekh lo hain kaisi bholi bhali

नख़रेवाली देखने में देख लो हैं कैसी भोली-भाली अजनबी ये छोरियाँ, दिल पे डालें डोरियां मन की काली वो तो कोई और थी जो आँखों से समा गई दिल में बेरहम, बेवफ़ा, अपना कुछ अता-पता बता तो दे बेकली, बेकसी, कुछ तो कम हो फिर से मुस्कुरा तो दे वो तो कोई और थी जो … Continue reading

१९५६ – नई दिल्ली – तुम संग प्रीत लगाई रसिया | 1956 – New Delhi – tum sang preet lagayi rasiya

तुम संग प्रीत लगाई रसिया मैंने जानके जान गँवाई रसिया ओ हाय मैं मर गई, बेदर्दी तेरे प्यार में गोरी-गोरी रात के गोरे-गोरे चाँद की तुझको क़सम राजा, लौटके आजा पहले मिलन की रंगभरी शाम को कैसे भुलाऊँ सैंया, तू ही बता जा मौसम ले अंगड़ाई रसिया मैंने जानके जान गँवाई रसिया ओ हाय मैं … Continue reading